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July 29, 2022

प्रेमचंद की शख़्सियत



अपूर्व राय/ Apurva Rai

एक बार फिर 31 जुलाई आ गई है और इस साल उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 142वीं जयंती मनाई जा रही है. जयंती का मौका है तो गोष्ठियां हो रही हैं, समारोह हो रहे हैं, उनकी रचनाओं का मंचन हो रहा है और कहीं कथागोई हो रही है.

एक ऐसे समय में जब शिक्षा का विस्तार न के बराबर था, स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई हज़ारों में एक को प्राप्त होती थी प्रेमचंद ने शिक्षा भी हासिल की और कलम का ऐसा जादू दिखाया कि दुनियावाले स्तब्ध रह गए. कायस्थ परिवार में जन्में प्रेमचंद को अगर कलम का जादूगर भी कहा जाए तो ग़लत न होगा.

मुंशी अजायबराय श्रीवास्तव और आनन्दी देवी के पुत्र धनपतराय श्रीवास्तव का जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के समीप लमही ग्राम में हुआ था. यही धनपतराय आगे चलकर मुंशी प्रेमचंद के नाम से विश्वविख्यात हुए और उनका लेखन हर-दिल-अज़ीज़ बन गया, आज भी है और आने वाले लंबे दौर तक बना रहेगा.  आज भी कोई ऐसा शख़्स नहीं होगा जो यह कह दे कि उसने प्रेमचंद को नहीं पढ़ा है. बेशक खरीद कर न पढ़ा हो, दो-चार उपन्यास न पढ़े हों, अनेकों कहानियां न पढ़ी हों पर कुछ-न-कुछ तो स्कूली सिलेबस में ज़रूर पढ़ा है. यह बात दीगर है कि स्कूल के सिलेबस में पढ़कर पूरे में से पूरे नंबर ले आए किन्तु बाद में कभी अलग से और ज़्यादा पढ़ने की इच्छा न हुई हो. स्कूल की मजबूरी ही सही पर प्रेमचंद की कहानियों ने हम सबके दिलों को छुआ ज़रूर है. और ऐसा छुआ है कि तमाम उम्र उसे भुला पाना नामुमकिन है. यही वो बात है जो प्रेमचंद के प्रेमचंद बनाती है.

जब बात स्कूल की, सिलेबस की और शिक्षा की चल पड़ी है तो प्रेमचंद की शिक्षा का ज़िक्र करना भी ग़लत न होगा. उन्होंके उस ज़ाने में स्कूल और कॉलेज से डिग्री हासिल जब यह हर किसी की सोच तक से परे थी. उन्होंने 1898 में मैट्रिक (हाई स्कूल) पास किया और एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए. इसके बाद 1910 में उन्होंने अंग्रेज़ी, दर्शन (फिलॉसोफी), फारसी और इतिहास लेकर इंटर पास किया. 1919 में उन्होंने बी.ए. की डिग्री हासिल की और शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हो गए.  यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि प्रेमचंद के मैट्रिक और इंटर करने के बीच में एक लंबा फासला है. इस फासले की वजह यह है कि उस ज़माने में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए गणित अनिवार्य था जो उन्हें कतई पसंद न था. लिहाज़ा उन्होंने तब तक इंतज़ार किया जब तक गणित की अनिवार्यता खत्म न हो गई. इसके बाद उन्हें कौन रोक सकता था.

प्रेमचंद की लेखनी ही नहीं उनकी शिक्षा के प्रति लगन भी आज के छात्र-छात्राओं के लिए प्रेरणास्रोत है.  आज के दौर में कौन भला इंतज़ार की बात सोच सकता है. लेकिन प्रेमचंद के अंदर आगे पढ़ने की ऐसी ललक थी कि उन्होंने उस बाधा के हटने का लंबा इंतज़ार किया जो उनको आगे पढ़ने से रोक रही थी. जैसे ही बाधा हटी, रास्ता साफ हुआ और वो आगे बढ़ निकले. जिस इंसान में सही मायने में लगन होती है वो ऐसा ही होता है शायद. आज के आधुनिकता के दौर में इंतज़ार, सब्र जैसे गुण शायद विलुप्त हो गए हैं. आज का छात्र अव्वल रहना चाहता है लेकिन ऊंचे नंबरों के सहारे न कि सच्चे ज्ञान के ज़रिये. अब नंबर कैसे लाए जाएं, क्या पढ़कर लाए जाएं, कहां से पढ़कर लाए जाएं जैसी बातें अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं. आपकी निष्ठा नंबरों की इस दौड़ में कहीं खो गई है. आज तक कितने लोगों ने पूछा प्रेमचंद के नंबर कितने आते थे. उन्होंने अपने गांव, शहर या ज़िले में टॉप नहीं किया था. उनके डिग्री हासिल करने की ख़बर अखबारों में नहीं छपी थी. प्रेमचंद इसलिए नहीं जाने जाते कि उन्होंने कोई बड़ी परीक्षा उत्तीर्ण की थी. ऐसा भी नहीं है कि यह सब उस ज़माने में नहीं था. ज़रूर था, लेकिन प्रेमचंद का मकसद दौड़ लगाना नहीं था. सौ में सौ लाने वाले आज के छात्र प्रेमचंद की कहानी की बात तो करते हैं लेकिन सिलेबस में पढ़ी कहानी के अलावे दो कहानियां या उपन्यास भी नहीं गिना सकते, पढ़ने और समझने की बात तो दूर रही. उनकी लगन की तरफ इन बच्चों का ध्यान जाता ही नहीं. काश प्रेमचंद आज के छात्रों के लिए मेहनत और लगन की मिसाल बनते और कुछ बेहतर कर दिखाते बजाय उस दौड़ का हिस्सा बनने के जिसका कोई अंत नहीं और शायद कोई फलसफा भी नहीं. अपनी काबिलियत में इजाफा करना ही शिक्षा का असली मकसद होता है और डिग्रियां उसका ज़रिया. मेरे ख़्याल से.

पारिवारिक संघर्ष

प्रेमचंद अभी छोटे ही थे कि उनकी माता का देहांत हो गया और उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया. अजायबराय की दूसरी पत्नी ने भी एक पुत्र महताब राय को जन्म दिया. प्रेमचंद को परिवार में एक छोटे भाई का सुख प्राप्त हुआ. अभी परिवार चल ही रहा था कि कुछ वर्षों पश्चात अजायबराय चल बसे. परिवार के लिए कठिन समय आ गया. विमाता के बाद प्रेमचंद ही घर के ज्येष्ठ पुत्र थे और ज़िम्मेदारियां उनके कंधों पर आ पड़ीं. ऐसे कठिन समय में भी उन्होने अजब समझदारी, साहस और  परिपक्वता का परिचय दिया. कई लोग प्रेमचंद की विमाता की चर्चा ज़रूर करते हैं पर किसी ने भी कभी पारिवारिक वैमनस्य, कटुता या इख़्तिलाफ की बात नहीं की. और अगर की तो यह सरासर ग़लत होगा. 

कम ही लोग जानते हैं प्रेमचंद और उनके अनुज महताब राय, जिन्हें वो छोटक कहकर पुकारते थे, के रिश्तों के बारे में. दोनों भाइयों में उम्र का बड़ा फासला था लेकिन फासले भी कभी नज़दीकियां पैदा कर देते हैं. बड़े होने के नाते उनका प्रेम छोटे भाई पर सदा बना रहा. महताब खुद मेधावी थे और उस ज़माने में प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी की शिक्षा कलकत्ते से हासिल की थी. बड़े होने के ही नाते प्रेमचंद को अपने अनुज का आदर और सम्मान ताउम्र मिलता रहा जिसके वो हक़दार थे. जीते जी ही क्यों मरणोपरांत भी छोटक ने वो किया जो भाई प्रेम की मिसाल है और सदा रहेगी. प्रेमचंद की मृत्यु के पश्चात भारत सरकार की तरफ से तत्कालीन राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद ने लमही गांव में स्मारक बनाने की इच्छा ज़ाहिर की. समस्या तब उत्पन्न हुई जब कुर्मियों के बहुल्य वाले गांव में किसी ने भी एक कायस्थ के लिए ज़मीन देने से इंकार कर दिया. महामहिम की मुलाकात महताब से हुई. ऐसे समय में छोटे भाई ने वो फैसला लिया जो आज के ज़माने में कोई सोचने मात्र से सिहर जाता. महताब ने अपना घर, जो प्रेमचंद निवास से सटा हुआ था और अंदर-ही-अंदर जुड़ा भी था, सरकार को पेश कर दिया. इतना ही नहीं छोटे भाई ने सके बदले एक रुपया भी मुआवज़े के तौर पर स्वीकार नहीं किया. वो कर भी नहीं सकते थे क्योंकि परिवार की प्रतिष्ठा और बड़े भाई के प्रेम से बड़ा और क्या हो सकता है !

आज लमही में जो प्रेमचंद का स्मारक हम सब देखते हैं वह एक ज़माने में महताब राय का घर हुआ करता था. घर देने के बाद महताब राय अपनी पत्नी, नौ बच्चों और माता के साथ वाराणसी शहर में किराए के एक घर में रहने लगे. किस्मत की बात देखिये कि वह दोबारा अपना घर नहीं बना पाए और शहर के जगतगंज इलाके के उस किराए के घर में ही उनका निधन हुआ. इसे ईश्वर का वरदान ही कहेंगे कि महताब राय कि सभी संतानों ने उच्च शिक्षा हासिल की और जीवन में अपने माता-पिता का नाम रोशन करने के साथ ही परिवार की प्रतिष्ठा को चार-चांद लगाए. जिन नौ संतानों के पिता ने अपना घर भाई के स्मारक के लिए सरकार के हवाले कर दिया और सारी उम्र किराए के घर में गुज़ार दी उन सभी संतानों में से कोई ऐसा नहीं रहा जिसने अपना घर न बनवाया हो. ऐसा तभी मुमकिन है जब ईश्वर की कृपा हो, पिता प्रतापी हो और संताने मेहनतकश. मैं उनके तीसरे पुत्र विनय कुमार राय का पुत्र हूं. मेरे पिता का जन्म भी लमही गांव में हुआ, प्रारंभिक शिक्षा सारनाथ और वाराणसी के मशहूर क्वींस कॉलेज और उच्च शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से हुई. यह भी इत्तेफाक की बात है कि जब विनय बीएचयू में पढ़ रहे थे तब भारत के राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन उसके वाइस चांसलर थे और उनके गुरू भी. कई जगहों पर काम करते हुए वो दिल्ली आ बसे और वहीं नोएडा में अपने आवास का निर्माण कर जीवन के आखिरी पल बिताए.

उधर ऐसा नहीं था कि प्रेमचंद ने बहुत रुपया कमाया. वो खुद आजीवन आर्थिक संघर्ष करते रहे और यह बात सर्वविदित है कि उनका निधन अच्छा इलाज न मिलने के कारण हुआ. अगर उन्हें किसी अच्छे शहर के बड़े डॉक्टर का इलाज मिल जाता तो शायद वो कुछ वर्ष और साहित्य की सेवा कर पाते और वो सब काम पूरा कर पाते जिन्हें वो अधूरा छोड़ गए.  प्रेमचंद का जब निधन हुआ तो उनके पास भी बैंक बैलेंस नाम की कोई चीज़ नहीं थी. लेकिन इसे उनका प्रताप और प्रभु का आशीर्वाद ही कहेंगे  कि उनकी तीन संतानों ने अपने पिता का नाम खूब रोशन किया. उनके दोनों पुत्र श्रीपत राय और अमृत राय योग्य पिता की योग्य संतान कहलाए और हिंदी साहित्य की वो ख़िदमत की जो फ़कीद-उल-मिसाल है.

महज़ प्रेमचंद का जीवन ही संघर्षमय नहीं रहा बल्कि पूरा परिवार ही इससे जूझता रहा. सफलताएं मिलीं पर इसमें एक पीढ़ी चली गई. आज जब हम प्रेमचंद की बात करते हैं, उनके लेखन की बात करते हैं, उनके संघर्षों की बात करते हैं तो ऐसे में हम उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.

थोड़ा हटकर है लेकिन यह कहना अनुचित भी नहीं कि प्रेमचंद के पुत्र श्रीपत और महताब राय के पुत्र और  मेरे पिता विनय कुमार राय दोनों ही दिल्ली में आ बसे थे. दोनों भाइयों में उम्र का बड़ा फासला था; श्रीपत मेरे पिता से काफी बड़े थे. तीन दशकों से अधिक दोनों का साथ रहा और मेरी स्मृति में कोई महीना ऐसा नहीं गुज़रा जब दोनों एक-दो बार आपस में न मिलते रहे हों, दोनों के बीच लिहाज़, आदर, फिक्र और स्नेह में कभी कोई कमी आई हो या फिर दोनों ने साथ बैठकर घंटों एकांत में गप्प न की हो. आज जबकि दो सगे भाई एक-दूसरे से नहीं मिलते ऐसे में भ्राता प्रेम की मधुर यादें और तमाम बातें मेरे दिमाग में ताज़ा-तरीन हैं.

आज संपूर्ण प्रेमचंद परिवार खुशहाल और यशस्वी परिवार है और यही बात सीखने की है. आज के नए दौर में जब बात डिग्री ख़त्म होने से पहले नौकरी मिलने और सालाना पैकेज की होती है तो कुछ अजीब सा लगता है. आज जब लोग अपना ही ख़र्च उठाने में दिक्कत महसूस करते हैं तो कुछ अजीब सा लगता है. आज जब लोग माता-पिता की ज़िम्मेदारी, भाई-बहन के खर्च को बोझ कहने लगते हैं तो कुछ अजीब सा लगता है. ज़रूरत महज़ प्रेमचंद की किताबों को पढ़ने की नहीं है बल्कि उस शख्सियत के जीवन को भी पढ़ने की है जो हमें बहुत कुछ प्रेरणा और शिक्षा दे जाता है. मेरे ख़्याल से.

जीवन की सादगी

पिछले कुछ समय से प्रेमचंद की एक तस्वीर बहुत चर्चा में है जिसमें वो अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ एक कुर्सी पर बैठे हुए हैं. तस्वीर को चर्चा में आने की वजह प्रेमचंद के फटे जूते हैं जिसमें से शायद उनके पैर की उंगलियां बाहर आ रही हैं. यह तस्वीर मुझे भी कई जगहों से प्राप्त हुई. अब समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहूं. मैंने किसी को जवाब तो नहीं दिया पर मन में सोचा ज़रूर कि लोग सोशल मीडिया के ज़रिये तस्वीर एक-दूसरे को भेजकर आखिर कहना क्या चाहते हैं. अजीब से लगता है जब फटे जूते पहनने वाले प्रेमचंद की तस्वीर शेयर करने के बाद खुद महंगे जूते पहनकर बाज़ार में निकल जाते हैं. 

मैंने इस तस्वीर में प्रेमचंद के जूतों के अलावे और भी बहुत कुछ देखा. इस तस्वीर को दोबारा देखिए और आप पाएंगे कि जिस कुर्सी पर वो महान कथाकार बैठा है क्या आप वैसी कुर्सी पर बैठना पसंद करेंगे? बैठना तो दूर शायद आप ऐसी कुर्सी अपने घर पर रखना भी पसंद न करें. इतना ही नहीं, आप उनके और उनकी पत्नी के वस्त्रों को भी देखिए. एकदम साधारण सूती धोती-कुर्ता है दोनों की देह पर. आज के दौर में इतने साधारण वस्त्र कौन धारण करता है. ज़माना तो ऐसा आ गया है कि काम जैसा भी हो वस्त्र बेहतरीन होने चाहिएं. आप उस कमरे को भी देखिए जिसमें दोनों बैठे हैं. निहायत साधारण चार दीवारें हैं, और पीछे का दरवाज़ा ऐसा कि कोई पसंद भी न करे. आज हम शानदार कमरों में बैठते हैं, महंगे पर्दे लगवाते हैं, महंगा फर्नीचर रखते हैं, महंगी कालीन डलवाते हैं, एयरकंडिशनर के बिना गर्मी में बेचैन हो जाते हैं और न जाने क्या-क्या. पर इन सबके बावजूद हममें से कितने लोग जीवन में एक काम भी ऐसा कर जाते हैं जो दूसरों के लिए मिसाल बने? अजीब सा लगता है !

दुनिया में सबने प्रेमचंद के फटे जूते तो देखे पर कितनों ने उनके चेहरे को ग़ौर से देखा. अब देखिये और महसूस कीजिये उनके चेहरे पर झलकता सुकून, ललाट पर छाई प्रतिभा और होठों पर न रुकने वाली मुस्कान. इतना ही नहीं उनके माथे पर कहीं शिकन या तनी हुई भवें दिखाई पड़ती हैं? कतई नहीं. मुफलिसी और सादगी में भी कितना खुश है वो इंसान. लेखनी के अलावा यही वो ख़ुसूसियत है जो प्रेमचंद को असाधारण होने का दर्जा प्रदान करती है.

महसूस तो यही होता है कि प्रेमचंद की सादगी का पाठ पढ़ने में लोगों से कहीं चूक हो गई. सादगी दिखावे की चीज़ नहीं है और न ही दूसरों को नसीहत देने की. सादगी वो भी नहीं कि आप निभाने की उम्मीद तो किसी और से रखें और खुद दिखावे की दौड़ में शामिल हों. सादगी एक जीवन का दर्शन है, एक दिनचर्या है जो वही अपना सकता है जो मेहनत, सब्र, त्याग और ज़िम्मेदारी निभाने में यकीन रखता है. प्रेमचंद का जीवन सादगी, संस्कार और परंपरा की एक बेहतरीन मिसाल है. काश आज की पीढ़ी भी इससे सबक ले पाती. मेरे ख़्याल से. 

मैं इसे अपनी खुशकिस्मती मानता हूं कि मेरा जन्म ऐसी महान शख़्सियत के कुन्बे में हुआ. यह भी मेरी खुशनसीबी है कि मेरे पूर्वज न सिर्फ मेहनतकश और काबिल थे बल्कि संस्कारों के भी धनी थे. मुझे इस बात पर फक्र है कि मैंने विरासत में ऐसे गुण पाए हैं जो मुझे आडंबर से जुदा रखते हैं, सादगी में यकीन दिलाते हैं, आदर, सम्मान और त्याग की भावनाओं की कद्र करना सिखाते हैं. तो आप अगली मर्तबा जब भी प्रेमचंद की तस्वीर देखें तो उनके जूतों को ही न देखें, आप उनके चेहरे को भी देखें जहां आप तसल्ली का भाव पाएंगे, उनके ललाट को देखें जहां तेज़ दमकता होगा, उनके माथे को देखें जहां शिकन नदारद मिलेगी और उनके होठों को देखें जो हर हाल में मुस्कुराते रहने का पैगाम देते हैं. 

ऐसी महान शख़्सियत को मेरी श्रद्धांजलि.

 


July 29, 2019

जिस गांव ने प्रेमचंद को प्रेरणा दी



विनय कुमार राय
प्रेमचंद के उपन्यास आपने पढ़े होंगे और कहानियां भी. आपको लगा होगा कि उनकी कहानियां बेजोड़ हैं, उनके उपन्यास किसी मुल्क की जीती-जागती तस्वीरें हैं जिन्हें हम और आप हिन्दोस्तान कहते हैं. वही इकबाल वाला हिन्दोस्तान याद होगा आपको, 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' वाला हिन्दोस्तान.

वैसे तो अपना मुल्क सबको प्यारा होता है, अपनी धरती सबको भाती है, सभी वतन की मिट्टी को प्यार करते हैं, पर कम ही होते हैं जो उस मिट्टी पर जान निसार करते हैं, उसी मिट्टी में मिल जाना चाहते हैं. ऐसे ही चंद जांबाज़ों में प्रेमचंद का भी नाम लिया जाता है. उन्होंने अपने मुल्क के लिये, अपनी मिट्टी के लिये, अपने हमवतनों के लिए क्या नहीं किया. मगर उन्होंने यह लड़ाई तलवार से नहीं लड़ी, बमों का सहारा नहीं लिया, दूसरे के मुल्क ढहाकर अपनी हिफाज़त की आवाज़ बुलंद नहीं की, बल्कि अपने मुल्क की आज़ादी के लिये अपनी कलम से वह जादू पैदा किया जिसने कौम के सोए हुए लालों की आंखों से पर्दा हटा दिया. उन्होंने जनता को तिलस्मी दुनिया से उतारकर धरती पर टिका दिया. जो अभी तक अपनी ही मूरत को पहचान नहीं सके थे उन्हें नई आंख दी, नई रोशनी दी. इन्हीं नई आंखों से लोगों ने अपने ऊपर के नीले आसमान को देखा, अपनी धरती के लहलहाते खेत देखे, धरती को संवारते हुए हल देखे, बैल देखे और उस दुखी किसान को भी देखा जो खुद चिथड़ों में सिमटा हुआ, मौसम की बेढंगियों से होड़ लेता हुआ उन हलों के पीछे चिरन्तन  विश्वास से चला जा रहा था. 

लेकिन आश्चर्य है कि प्रेमचंद के पहले क्या लिक्खाड़ नहीं हुए? क्या उनके पहले साहित्य वीरान था? नहीं!  लिखनेवाले थे, पर उनकी दृश्टि अलग थी, उनका मकसद दूसरा था. वे साहित्य को तफरीह की चीज़- एक आरामगाह समझते थे जहां पर बैठकर दुनिया के लोग अपना ग़म ग़लत कर सकें, कहकहे लगा सकें. इसीलिए तो उन्होंने काल्पनिक साहित्य लिखे. सदियों से गुलामी में कैद हिंदोस्तानी को अपनी रोज़-रोज़ की कशमकश के बाद ऐसा ही मसाला भाने लगा. वह अपने को इस साहित्य में डुबो देना चाहता था, अपना रज मिटाना चाहता था, हकीकतों से मुंह चुराकर कुछ देर परियों के मुल्कों की सैर करना चाहता था. इसलिए उसने इस साहित्य का आह्वाहन किया. लेकिन कुछ ऐसी ही परिस्थिति में प्रेमचंद ने साहित्य में प्रवेश किया-- एकदम नयी सजधज के साथ, एकदम नए दृश्टिकोण से. उन्होंने जनता के सामने जनता की तस्वीर खींची, उन्हीं की भाषा में बातचीत की, उन्हीं के मसलों को उभारा-- उनकी ग़रीबी को, उनकी ग़ुलामी को, उनके शोषण को. पर सच तो यह है कि ये जनता की ही समस्याएं नहीं थीं, ये तो उनकी समस्याएं भी थीं. वह खुद भी गुलामी से, ग़रीबी से और शोषण से तंग आ गए थे; उनसे मुक्त होना चाहते थे, लोगों को मुक्त कराना चाहते थे. फलत: अपनी कृतियों में उन्होंने अपने दिल की आवाज़ बुलन्द की-- वही आवाज़ जो जनता की आवाज़ की प्रतिध्वनि थी.
 
आख़िर प्रेमचंद की आवाज़ में इतनी मज़बूती क्यों थी?  उनकी कलम में सल्तनतों को हिला देने वाली ताक़त कहां से आई, क्यों आई? क्यों उनको समाज की सदियों से पलती हुई नाकिस और गलीज़ बीमारियों को मार भगाने में कामयाबी हासिल हुई? इसीलिए न कि जिस फिज़ां में वो सांस ले रहे थे, जिस ज़मीन पर वह खड़े थे उसे उन्होंने ग़ौर से देखा-भाला था. उन्होंने हिंदोस्तान को गांवों में देखा और इसीलिए उन्होंने गांव को ही अपना रंग-ए-महफिल चुना.

गांव की मुक्त हवा में उन्होंने सांस ली थी जिसने उन्हें गुलामी के खिलाफ जेहाद बोलने के लिए ललकारा. वहां की गरीबी से उनका कलेजा चाक हुआ था-- तब कहीं जाकर उन्होंने अपने उपन्यासों में इसका अक्स उतारा. गांवों की संकीर्णता से विचलित हो चुके थे तभी उन्होंने इसे दूर करने की ठानी. उन्होंने गांव के दामन में अपनी उम्र गुज़ारी थी. यही एक बड़ी वजह है कि गांवों को, वहां के रहने वालों को, उनके सवालों को, उनकी मजबूरियों को प्रेमचंद ने महसूस किया और जनता के सामने उनको उतारने की कोशिश की.

प्रेमचंद के होरी का गांव

जिस गांव ने प्रेमचंद को प्रेरणा प्रदान की, जिस गांव में प्रेमचंद का होरी रहता था वह गांव इसी बनारस के आंचल में, शहर की रंगीनियों से कोई तीन-चार कोस की दूरी पर अब भी बरकरार है. आप समझते होंगे यह गांव कोई जुदा किस्म के नाक-नक्शे का होगा जिसने प्रेमचंद को जनमाया! नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है. यह गांव भी हिंदुस्तान के उन्हीं हज़ारों-लाखों गांवों की तरह है जिन्हें आपने देखा होगा. यकीन कीजिये यहां की धरती भी ठीक वैसी ही है जैसी किसी और गांव की, यहां के खेतों में भी साल में एक बार गेहूं और जौ की बालियों में सुनहरा रंग चढ़ जाता है. यहां किसानों की बखारें भी कम से कम भर उठती हैं, वो एक बार फागुन में झूम के होली गा उठते हैं, एक बार उनकी बेटियों के हाथ भी पीले होते हैं. एक बार उनके दरवाज़े पर डफली और तुरही बजती है.

पर गांव का यह खाका जो मैंने आपके सामने खींचा है वह महज़ एकतरफा है. वहां सिर्फ रंगीनियां ही नहीं हैं-- वहां ग़रीबी भी है, भूख भी है. इस गांव में भी तीन-चौथाई इन्सान महज़ किसान होने का दम भरते हैं, पर वास्तव में वो किसान हैं नहीं. उनके पास अपनी ज़मीनें नहीं हैं. उनके पास अपनी बखारें नहीं हैं. उनके पास अपने गाय-बैल नहीं हैं. परायी ज़मीन को अपने खून-पसीने से सींचने वाले इन इन्सानों का तबका धरतीहीन मज़दूरों का है. ये वही इन्सान हैं जो ज़मीन में सोना उगाना चाहते हैं पर उनके पास ज़मीन नहीं है.

प्रेमचंदपुरी

ऐसे ही लोगों के बीच, ऐसी ही मिट्टी की गोद में प्रेमचंद ने इसी गांव में जन्म लिया. याद होगा गांव को जाने वाली सड़क किस कदर वीरान थी. सड़क में किस कदर दो-दो, तीन-तीन फुट के गढ्ढे और मनों गर्द थी और इन्हीं गढ्ढों में फंसी हुई बैलगाड़ियां जिनको गाड़ीवान बैलों से जोर में जोर मिलाकर, कभी पहियों को अपने फौलादी हाथों से ढकेलता हुआ, कभी बैलों पर डंडों की बरसात करता हुआ, कभी बैलों का मां-बहन से रिश्ता कायम करता हुआ उन्हें बढ़ावा देता था. पर अब हालात कुछ बदल गए हैं. सड़क पत्थर की बन गई है जिन पर गाड़ियां नहीं फंसती, जिस पर गर्द नहीं उठती. आप कहेंगे इस सड़क ने तरक्की की है, हिंदुस्तान ने तरक्की की है. हां, मुल्क करवट ले रहा है पर मुझे तो गांव की वही हालत बयान करनी है जिसने प्रेमचंद के खून में उबाल पैदा किया था, जिसने उन्हें कलम उठाने के लिए प्रेरित किया था. 

यह सड़क उन दिनों एक वीरान इलाके से होकर गुज़रती थी और रात ढलने के बाद उन दिनों लोग अकेले इस सड़क से गुज़रने में खौफ खाते थे. ऐसी ही सड़क के किनारे बसे हुए लमही ग्राम का ज़िक्र है जिसमें प्रेमचंद के दोनों घर अब भी खड़े हैं-- एक जिसमें उन्होंने जन्म लिया और दूसरे जिसे उन्होंने खुद बनवाया था.

यह गांव एक छोटा ग़रीब किसानों का गांव है जिसमें कुछ कुनबी, कुछ लाला, कुछ कहार, कुम्हार, एक-आध बढ़ई और इसी तरह के चन्द और फिरके के लोग बसते हैं. प्रेमचंद का घर गांव के एक सिरे पर बसा है जिसके बाद बागों की शुरूआत है और उसके बाद खेतों की. इसी घर में रहते हुए प्रेमचंद ने अपनी साधना आरम्भ की. यह घर किसी नुक्ते से बेमिसाल नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह वैसा ही एक मामूली घर है जो कहीं भी पाया जा सकता है. फर्क इतना ही है कि गांव का घर होते हुए भी यह ईंट-पत्थर का बना है, मिट्टी-गोबर का नहीं. पर इस घर का निर्माता मिट्टी-गोबर के घर में ही पैदा हुआ था जो अब भी वैसा ही मौजूद है. प्रेमचंद ने अपने घर के बाहर जहां भी नज़र डाली उसे ग़ौर से देखा, परखा, गुना और सीने में सजो लिया. उन्होंने गांव को कुनबियों की दालानों में बैठकर गप्पें भी लगाईं, उनके कोल्हू के पास खड़े होकर गन्ने का रस भी चखा और ताज़े-ताज़े बनते हुए गुड़ का भी मज़ा लिया; उन्होंने इन किसानों को मिट्टी के किनारे-किनारे आग तापते हुए और इसी आग में भुने हुए आलू खाते भी देखा, उनकी बातें सुनीं, समझीं और उनके साथ हमदर्दी का इज़हार किया. उन्होंने पूस की रात में घुटनों तक धोती पहने और जिस्म पर बोरे को समेटे हुए किसानों को खेतों की रखवाली करते देखा. उन्होंने जेठ की चिलचिलाती दुपहरी में किसानों को नंगे- बदन, नंगे- पांव खेतों में गोड़ाई करते देखा है, उन्हें दिन-दिन भर पुरवट से पानी निकालते देखा, जौ के आटे की बनी उनकी मोटी-मोटी रोटियां चखीं. गांव की इन समस्त अनुभूतियों ने प्रेमचंद के अंतर को सींचा, उनके ह्रदय में भावनाओं का वह अदम्य स्रोत प्रवाहित कर दिया जिसे वो रोक न पाए और जो उनकी लेखनी से फूट पड़ा. 

लमही नाम का यह गांव जिसके बारे में आपने कुछ बातें पढ़ीं, जिसका नाम आपकी नज़रों से गुज़रता रहता है, पाण्डेपुर-आज़मगढ़ वाली सड़क पर प्राय: ढाई मील की दूरी पर बाएं किनारे पर बसा है. हिन्दी साहित्य का इतिहास इस गांव को भुला नहीं सकता. यह एक तीरथ है जिसे हम और आप भूल बैठे हैं, पर मुझे विश्वास है कि एक न एक दिन हिन्दुस्तान चेतेगा और लोग इस गांव को देखने के लिए तड़प उठेंगे.

लमही गांव ने प्रेमचंद को वह चीज़ दी जिसने उन्हें मुल्क की आंख का तारा बना दिया. प्रेमचंद ने इस छोटे से गांव को क्या समझा गोया उन्होंने हिन्दुस्तान को समझा, लोगों की नब्ज़ जानी और उनके दिल की धड़कनों को सुना और ऐसी ज़बान में हमारे सामने रखा जिसे पढ़कर हम और आप अपनी बेबसी पर दो बूंद आंसू की टपका देते हैं.

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नोट:
यह लेख मेरे पिता विनय कुमार राय ने वाराणसी से प्रकाशित होने वाले 'आज' अख़बार के लिये सन 1955 में लिखा था. मुझे इस अख़बार का पन्ना बड़ी जर्जर हालत में मिला जो हाथ से उठाते ही टूटा जा रहा था. किसी तरह से मैंने इसकी तस्वीर खींची और उसकी फोटोकॉपी करवाकर इसे टाइप किया और इसे अपने ब्लॉग में जगह देने का सौभाग्य मिला. अख़बार के मूल पृष्ठ की तस्वीर भी आप सबके सामने रख रहा हूं.
 
मेरे पिता की लेखनी में गजब का प्रवाह था और मेरा ऐसा मानना है कि अगर उन्होंने लेखन को ही अपने जीने का ज़रिया बनाया होता तो हम सबको अपनी भाषा और लेखनी से धन्य करके ही दुनिया से अलविदा कहते. वो ज़्यादा तो नहीं लिखते थे लेकिन फिर भी अगर कोई उनसे लेख मांगता तो निराश नहीं करते थे. शायद यह मेरी कमी थी या फिर नासमझी कि मैं उनके कई अच्छे लेख सजो कर नहीं रख पाया. इसका मुझे अफसोस है और सदैव रहेगा. 

प्रस्तुत लेख को अपने ब्लॉग में लाना केवल टेक्नोलॉजी के कारण संभव हो पाया वरना मेरे पिता ने प्रेमचंद पर ही कुछ अन्य लेख भी लिखे थे जो अब न जाने कहां खो गए हैं. 

मुंशी प्रेमचंद के अनुज महताब राय के तीसरे सुपुत्र मेरे पिता का जन्म भी लमही गांव में ही हुआ था. उनकी तालीम क्वींस कॉलेज, वाराणसी, और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से हुई थी. जीवन के उतार-चढ़ाव को पार करते हुए विनय दिल्ली आ पहुंचे और यहीं के हो के रह गए. 

किस्मत की बात कि मुंशी प्रेमचंद के ज्येष्ठ पुत्र श्रीपत राय भी दिल्ली आ बसे और इस तरह दोनों चचेरे भाइयों ने जीवन का एक लंबा समय एक ही शहर में एक दूसरे के सानिध्य में व्यतीत किया. मैंने विनय और श्रीपत के रिश्तों को बहुत नज़दीक से देखा है और आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि दोनों में एक-दूसरे के लिए जो आत्मीयता, प्रेम और सम्मान जीवन पर्यंत रहा वो आज के ज़माने में दो सगे भाइयों में पाना दुर्लभप्राय है.

विनय कुमार राय ने मुंशी प्रेमचंद पर एक अन्य लेख भी लिखा था जो अंग्रेज़ी के अख़बार 'पैट्रियट' (PATRIOT) में छपा था जहां मैं कार्यरत था. इस लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को कापी/ पेस्ट करें. 

LINK:       

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प्रेमचंद: ज़िदगी के आइने में (7 Oct, 2019)

https://apurvarai.blogspot.com/2019/10/blog-post.html







2)



The Genius of Premchand (28 July, 2017)  

http://apurvaopinion.blogspot.com/2017/07/the-genius-of-premchand.html