April 17, 2020

ठहरे कदम !





अपूर्व राय

ब्रह्मा की रचाई इस सृष्टि में कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है. पृथ्वी सहित सभी ग्रह अपनी गति से सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं, धरती पर रोज़ाना सूरज के उगने के साथ सवेरा होता है और फिर डूबने के साथ रात होती है, हर रात आकाश में सितारे जगमगाते हैं, चांद निकलता है और अपनी शीतल छटा बिखेरता है, नीले गगन में मेघ विचरण कर रहे हैं, पवन अपनी गति से बह रही है, नदियों का शीतल जल मंद गति से बह रहा है, समंदर की लहरें कोलाहल करती हुई रेतीले किनारों पर उछाल मार रही हैं और ऋतुएं अपने समय से करवट ले रही हैं. 

एक तरफ जहां सृष्टि में सब कुछ अपनी गति से चल रहा है वहीं धरती पर इंसानी ज़िंदगी की रफ्तार थम गई है. हर कोई घर की चाहरदीवारी के अंदर बसर करने को मजबूर हो गया है. जीवन में बहुत कुछ थम सा गया है और ठहर गए हैं हमारे और आपके कदम.

पूरे संसार में कोरोना, या फिर कोविड-19, नाम का एक वायरस इंसानों के गले में हमला बोल कर उसकी इहलीला समाप्त कर रहा है. दुनिया का हर शख्स डरा हुआ है, सहमा है, आदमी आदमी से दूर जा रहा है इस खौफ से कि न जाने किसके खांसने या छींकने से कोरोना नाम का यह वायरस वेताल की भांति उसके ऊपर आ बैठेगा और ज़िदगी हर लेगा. चीन के वुहान प्रांत से चले कोरोना वायरस की कोई दवा नहीं है और इससे निजात का एक ही तरीका है-- दूर-दूर रहना, पास न आना. हम और आप एक-दूसरे से न मिलें, एक-दूसरे के करीब न जाएं इसके लिये दुनिया के तमाम शहरों में लॉकडाउन, यानि घरों के भीतर ही रहो, का फरमान जारी है जिसके कारण ज़िंदगी भले ही चल रही हो लेकिन रफ्तार थम गई है, कदम ठहर गए हैं.

आज पूरी नगरी सुनसान दिखाई पड़ती है, सड़कें इतनी खाली कभी नहीं थी, बाज़ार इस तरह से कभी बंद नहीं थे, मोटर-गाड़ी इस तरह एक किनारे नहीं खड़ी थीं और पार्क कभी वीरान नहीं थे. कई दिनों से घर के भीतर रहने के बाद आज सुबह यह सोचकर बाहर निकला कि एक बार उस सड़क को देखूं तो जिसपर सुबह से ही मोटर-गाड़ी फर्राटा भरना शुरू कर देती थीं, इतनी भीड़ होती थी और शोर-शराबा होता था कि चलना मुहाल हो जाता था या फिर गाड़ी चलाने में चिड़चिड़ाहट होती थी. मुंह पर मास्क लगाया और बढ़ा दिये मैंने अपने मेरे ठहरे कदम. कुछ कदम चलकर घर के पीछे वाली सड़क तक ही गया क्योंकि ज़्यादा दूर जाना किसी भी तरह से मुनासिब नहीं था. सड़क के दोनों तरफ नज़र दौड़ाई तो मन धक से रह गया-- इस सड़क को इतना वीरान पिछले तीन दशकों में कभी नहीं देखा था. इक्का-दुक्का वाहन गुज़र गए, दो-चार लोग पैदल बढ़ गए, दूर सामने वाले चौराहे पर पुलिस का बैरिकेड और इसके अलावा कुछ नहीं. सुबह-सुबह इतना सन्नाटा मन को खटक गया. 

हां, सड़क पर चार-छह कूकुर भौंक रहे थे और कुछ गाएं आती-जाती दिखीं, शायद भोजन की तलाश में. सड़क पर आदमी नहीं दिखेगा और वहां जानवरों का राज होगा ऐसे दिन की कल्पना कभी नहीं की थी मैंने. बहरहाल यही आज की सच्चाई थी जो मेरी आंखों के सामने खड़ी थी. मौन खड़ा मैं कुछ देर तक इधर-उधर देखता रहा और फिर वापस घर लौट आया. 


अब फिर से घर के भीतर हूं. मेरी ही तरह लाखों-लाख लोग भी अपने घरों में बैठे है. कोरोना को हराने के लिये, अपने और अपनों के प्राणों की रक्षा के लिये सिमटी हुई ज़िंदगी ही आज की हकीकत है. ज़िंदगी के इस नए रूप में सब्र है, एहतियात है, त्याग है, मोहब्बत है, अभाव में सद्भाव है, कष्ट हैं लेकिन फिर भी जीने का जज़्बा है, कहीं मददगार हैं तो कहीं मुफ्तखोर भी हैं जो इंसान की परेशानियों का लाभ उठाते हुए रुपया बनाने का मौका नहीं छोड़ते.

सिमटी ज़िंदगी, सिमटी ज़रूरतें

इन दिनों एक नई जीवनशैली ऊभर कर आई है जिसमें ज़रूरतें अचानक घट गई हैं. करीब तीन हफ्ते से कार खड़ी है जिसके टायरों में लगातार कम होती हवा रोज़ परेशान करती है. महसूस होने लगा है गाड़ी भले ही खड़ी है लेकिन ज़िंदगी की गाड़ी बखूबी चल रही है. अब तो ऐसा भी ख़्याल कौंधने लगा है कि वाकई साल में कुछ दिन इसी तरह ही बिताने चाहिये. क्या ज़रूरत है एक से अधिक गाड़ी की ? लगने लगा है कि एक ही ठीक है, खुद के लिए भी, समाज के लिये भी.

रोटी: जीवन इन दिनों घर के तीन कमरों में बसर हो रहा है. देर तक सोता हूं, बिस्तर पर ही चाय पीता हूं, बाहर बरामदे में बैठकर कुछ देर अख़बार के पन्ने पलटता हूं, फिर पत्नी के साथ इस बात की चर्चा होती है कि आज नाशते में क्या बने, लंच और डिनर क्या हो और हम दोनों में से कौन क्या बनाएगा. इन दिनों पत्नी भी फरमाइश करने लगी हैं तुम ऑमलेट बहुत अच्छा बनाते हो, खिलाओ तो मज़ा आ जाए; शाम को डिनर में कहती है तुम दम आलू बना दो मैं पूरियां बना दूंगी. वैसे पत्नी को सरप्राइज़ देने के लिए मैं अकसर चिकन बना के रखता था पर अब न तो चिकन मिल रहा है और न सरप्राइज़ की गुंजाइश है. पहले हम लोग कितने आलसी थी-- जिस दिन खाना बनाने वाली नहीं आई बस डिनर के लिए बाहर जाने का बहाना बना लिया. वैसे बाज़ार का स्वाद और चटोरापन इन दिनों बहुत खल रहा है, लेकिन दोनों वक्त खाना-बनाना, क्या बनेगा उसकी चर्चा करना, बर्तन धोना बुरा भी नहीं लग रहा.

अब घर की सफाई पर भी काम का बंटवारा होता है क्योंकि कामवाली नहीं आ रही है. कभी वो झाड़ू लगाती हैं और मैं पोछा और कभी इस भूमिका की अदला-बदली भी होती है. घरेलू काम का दबाव इतना बढ़ गया है कि इन दिनों हम दोनों के बीच बहसबाजी भी कम हो गई है और झगड़ा किए तो कई हफ्ते बीत गए हैं.

वाह, किसने सोचा था ऐसे भी दिन आएंगे. तीन कमरों के बीच ज़िंदगी सुनहरी और सरस भी हो सकती है, मेरे ख़्याल से.

कपड़ा: सरलता के एक और पहलू से भी रूबरू हुआ हूं. इन दिनों कपड़ों की आवश्यकता भी नगण्य हो गई है. दो जोड़ी कुर्ता-पायजामा और एक स्लीपर मेरे संगी-साथी बन गए हैं. पिछले कुछ सालों में इतना कुर्ता-पायजामा नहीं पहना होगा जितना बीते तीन हफ्तों में पहन डाला. एक धोता हूं, दूसरा पहनता हूं. खुशी पाने के लिए एकाध बार प्रेस कर लिया वरना ज़रूरत तो उसकी भी नहीं.

कपड़ों के मामले में मेरी पत्नी की विचारधारा गजब की है. हालांकि इन दिनों वो भी दो-चार जोड़ी में ही जीवन गुज़र-बसर कर रही हैं लेकिन यह उनके स्वभाव के बिलकुल विपरीत है. विवाह के दो दशकों से ऊपर बीत चुके हैं परन्तु जब कभी भी किसी समारोह वगैरह में जाना हुआ तो उनका फिर वही घिसा-पटा सवाल-- क्या पहनूं ? तीन-चार जोड़ी सामने रख दीं. अब बताओ कौन सा पहनूं ! मौका एक है, विकल्प चार. इतना विकट प्रश्न तो शायद सिविल सर्विसेज़ में भी नहीं पूछा जाता. जिस पर हाथ रख दीजिये वही ऑप्शन ग़लत. सच मानिये 'क्या पहनूं' को लेकर कई बार झगड़ा तक हुआ है. 

अब सच्चाई बताऊं तो पत्नी जी की वार्डरोब में कपड़े ठुंसे पड़े हैं, एक निकालती हैं और छह-सात दूसरे गिरते हैं. शुरू में टोका पर अब बोलता नहीं, बस नज़र दूसरी तरफ घुमा लेता हूं या फिर दूसरे कमरे में किसी बहाने चला जाता हूं. वजह समझ लीजिये क्योंकि हर बात कही नहीं जाती. किस्सा यहीं खत्म नहीं होता. वार्डरोब के अलावा तीन-चार बड़े-बड़े सूटकेस भी भरे हुए हैं. इतनी ही नहीं, एक-एक सूटकेस को बंद करने के लिये मुझ दास को पुकारा जाता है और जब तक सूटकेस के ऊपर बैठ न जाओ बंद नहीं हो सकता, यकीन मानिये.

महात्मा गांधी दो कपड़ों में जीवनयापन की बात कहते थे. सुनने में बहुत अच्छा लगता था और सोचता था उनके विचार को अपने जीवन में उतारूंगा ज़रूर, पर मोह-माया का चकल्लस ऐसा कि दिल में चाहत रहते हुए भी कभी ऐसा कर नहीं पाया. धन्य है लॉकडाउन, हमें गांधीवादी बना ही दिया बिना प्रयास के. सबसे बड़ा बदलाव तो उनकी जीवनशैली में दिख रहा है. अब जब गांधी का ज़िक्र आया है तो जीवन की सरलता और ज़रूरतों को कम करने के प्रयासों पर उनकी आत्मकथा पर से चंद लाइनें :

I had started on a life of ease and comfort, but the experiment was short-lived. Although I had furnished the house with care, yet it failed to have any hold on me. So no sooner had I launched forth on that life, than I began to cut down expenses. The washerman's bill was heavy, and as he was besides by no means noted for his punctuality, even two to three dozen shirts and collars proved insufficient for me. Collars had to be changed daily and shirts, if not daily, at least every alternate day. This meant a double expense, which appeared to me unnecessary. So I equipped myself with a washing outfit to save it. I bought a book on washing, studied the art and taught it also to my wife. This no doubt added to my work, but its novelty made it a pleasure.

बहरहाल, सच तो यह है कि ये सरलता और सादगी चंद दिनों की है. लॉकडाउन खत्म, और फरमाइशों का बाज़ार शुरू. सच बात तो यह है कि मैं भी इंतज़ार कर रहा हूं जब बाज़ार खुलेंगे और पत्नी इस संकल्प के साथ जाएंगी कि आज खुद के लिए कुछ नहीं खरीदना है. लेकिन दुकान के सामने पहुंचने के बाद न जाने कौन सा मंत्र चल जाता है कि सारे संकल्प भूल जाते हैं. एक-दो जोड़ी खरीदी जाती हैं और एक बार फिर संकल्प दोहराया जाता है अगली बार नहीं. पर वो 'अगली बार' आज तक तो आया नहीं. दिल की बात कहूं तो चाहता भी नहीं वो कल कभी आए. 

आखिर एक नारी का मन चंचल होता, उसे मैंने कभी रोका नहीं, रोकना भी नहीं चाहता. नारी की यही चंचलता तो जीवन का रस बनाए रखती है, नहीं तो सब कुछ नीरस है.

मकान: मेरे एक मित्र हैं. उनके जीवन में बैंक बैलेंस और तिजोरी में रखे रुपये और गहने का बहुत महत्व है. लक्ष्मी की आमद होती रहे इसका कोई मौका छोड़ते नहीं और लक्ष्मी बाहर न जाने पाए इसी में पूरी शक्ति लगा देते हैं. एक फ्लैट में रहते हैं और दो अन्य फ्लैट किराये पर दिये हैं. लेकिन फिर भी चित्त शांत नहीं है और इधर-उधर घर-ज़मीन देखते रहते हैं. कहते हैं लॉकडाउन से प्रॉपर्टी का बाज़ार गिर गया सोचता हूं कुछ खरीद डालूं, आगे फायदा मिलेगा.

उनकी संगत में रहकर पहले मुझे भी उनकी बातें तर्कसंगत लगने लगी थीं. लॉकडाउन के बाद से जीवन का जो पहलू सामने आया उसने मुझे बदल कर रख दिया; अब ऐसा लगने लगा है कि या तो वो मूर्ख हैं या फिर उनको ज़िंदगी का सुख भोगना नहीं आता. 'आगे फायदा मिलेगा' इस सोच में वो 'आज का सुख' गंवाए जा रहे हैं. मेरे ख़्याल से रहने के लिये एक ही घर, या फिर कहें तो दो कमरे ही बहुत हैं. प्यार इसी में पैदा होता है और पनपता है. बाकी का सुख तो पता नहीं कौन ले रहा है, बस मन भ्रमित रहता है जिससे सिवाय अभिमान और अहंकार के कुछ और हासिल नहीं होता.

लॉकडाउन के बीच ठहरे कदम जिस तरह घर की चाहरदीवारी, परिवार के प्रेम और जीवन की सरलता के इर्द-गिर्द घूमें हैं वो अकल्पनय है, अद्भुत है और अविश्वसनीय है.

कुदरत से करीबी: लॉकडाउन के दिनों में घर से न निकले की हिदायत है. लिहाज़ा सड़कों पर ट्रक, बस और मोटर-गाड़ी नहीं हैं और आसमान में विमानों का विचरण भी थमा हुआ है. बदलाव यह आया है कि सड़कों पर जानवर दिखने लगे हैं क्योंकि इंसानों का खौफ खत्म है. आकाश में पहले के मुकाबले अधिक पंछी उड़ान भर रहे हैं क्योकि शहर में कोलाहल नहीं है, धुंआ नहीं है, इंसानी गतिविधियां रुकी हुई हैं. जिस नीले गगन की बातें हम किताबों में पढ़ते थे इन दिनों वो साफ दिख रहा है. 

सबसे ज़्यादा आनंद तो सांझ के बाद आता है जब आसमन में तारे दिखने लगते हैं क्योंकि ऐसी झिलमिलाहट तो बरसों बरस से नहीं देखी थी. हमने तो इसका लाभ भी भरपूर उठाया. एक दिन तय हुआ कि क्यों न छत पर सोया जाए, नीले गगन के तले. बस बिछौना लगाया गया और मच्छरदानी के अंदर घुस गए. कुछ देर हेमंत कुमार और तलत महमूद के रसीले गाने सुने. फिर ख्याल आया कि क्यों न आज आसमान के तारे गिने जाएं-- एक बार फिर से अपना बचपन जिया जाए. रात भर साफ हवा में सांस ली और तब जाना कि घर की छत में जो नींद आती है और सुबह जो ताज़गी महसूस होती है वो बंद कमरे में, एयरकंडिशनर चलाकर भी नहीं प्राप्त होती. बता नहीं सकता कितनी सुखद अनुभूति थी. सोचने लगा फाइव स्टार होटलों में नाहक इतना पैसा खर्च करते हैं, कुदरत की गोद में एक रात बिता के तो देखिये ऐसा लाजवाब अनुभव और इतना आराम मुफ्त में ही मिलता है.

सचमुच प्रकृति बहुत सुन्दर है-- धरती, आकाश, हवा, पानी और बादल में.

एक बार फिर गांधी की दो लाइनें यहां पर कहना ज़रूरी लग रहा है :

You may have occasion to possess or use material things, but the secret of life lies in never missing them.

इंसानियत और हैवानियत: कोरोना वायरस की दहशत और लॉकडाउन के कारण थम गई ज़िंदगी की रफ्तार और जीवन के बदले स्वरूप ने मनुष्य के दो अन्य रूपों से भी मिलने का मौका दिया.

जब सब कुछ बंद है तो सामान की दिक्कत होना स्वाभाविक है. ग़रीब दो जून की रोटी के लिये भी परेशान भटक रहा है. ऐसे में मदद के लिये उठे हाथ देखने को मिले. जगह-जगह लोगों की सहायता के लिये अस्थाई शिविर खड़े हो गए हैं जहां मुफ्त में खाना खिलाया जा रहा है. कहते हैं न कि भूखे का पेट भरना ही असली नारायण की सेवा होता है. तमाम सह्रदय लोग नारायण बनकर ग़रीबों की सेवा में जुटे हैं और वो भी बिना किसी अपेक्षा के. ऐसी सुंदर भावना और दया ही इंसान को सबसे श्रेष्ठ प्राणी बनाती है.
किन्तु ऐसा नहीं है कि हमारे बीच सिर्फ नारायण रूपी लोग रहते हैं. हमारे बीच ऐसे भी लोग हैं जिनके जीवन में नगद नारायण का महत्व सर्वोपरि है, चाहे वो कैसे भी प्राप्त हों. जब मनुष्य जीवन की दिक्कतों का सामना कर रहा होता है और प्राण संकट में होते हैं तो चंद लोग ऐसी परिस्थिति का फायदा उठाने और अपनी तिजोरी भरने के मौके से भी नहीं चूकते. इंसान की मजबूरी का फायदा उठाने वाले ऐसे दानव इस बार भी चोरी-छुपे काला धंधा करते दिखे. 
कोरोना वायरस के मरीज़ों को वेंटिलेटर नाम की मशीन की ज़रूरत थी और बाज़ार में इसकी कमी हो गई. दानवों ने कम सप्लाई का भरपूर फायदा उठाया. इसी तरह किसी ने फेस मास्क बेचकर रुपया कमा लिया तो कुछ ऐसे भी दरिंदे दिखे जिन्होंने नकली सामान बनाकर उसे धोखे से बेच डाला. रुपया कमाने के लिये कुछ लोग नीचता की किस हद तक गिर सकते हैं यह सोचकर भी रूह कांप उठती है. मैंने देखा अपनी जेब भरने के लिये लोग किस तरह दूसरे की पीड़ा से नज़रें फेर लेते हैं. सोचता हूं किस मुंह से ऐसे लोग ईश्वर की प्रार्थना करते होंगे. शर्म आती है ऐसे दानवों पर जो उस देश में पैदा हुए हैं जहां गांधी कहते थे, "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे..."  
कुछ समय के लिए भूल ही गया हूं लॉकडाउन एक महामारी की रोकथाम के लिए लगाया गया है. दुनिया में लोग मर रहे हैं, हर तरफ डर का माहौल है, लोग तनाव से घिरे हुए हैं और जीवनयापन दुर्लभ हो गया है.

फिर भी खूबसूरती इसी में है कि हम अभावों और तकलीफों के बीच खुशी के चंद पल खोज लें. मैंने तो यही सीखा घर के भीतर रहकर जबकि हम और आप बाहर निकल नहीं सकते और ठहरे हैं हम सबके कदम. जीवन सादगी और सरलता से जिया जा सकता है, रोज़-रोज़ की हाय-हाय कम की जा सकती है बस ज़रूरत है सोच में थोड़ा बदलाव लाने की और उसके लिए थोड़ी कोशिश करने की. 

मेरे ख़्याल से.

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कोरोना दहशत के बीच बदली जीवनशैली और ठहरे कदमों को दर्शाते कई तरह के मेसेज मिल रहे हैं. आपके लिये एक :

वातावरण बिल्कुल शांत है, पैसे की जरूरत नही. तीन टाइम खा रहे है!  और अगर ऐसा ही रहा तो कपड़ों की जरूरत भी नही रहेगी.

सिर्फ दो नेकरों और दो  बनियानों से पूरा साल निकल जाएगा...

वातावरण इतना साफ की कार्बन डाइऑक्साइड का नामो निशान नही और साफ ऑक्सीजन ही लेंगे तो बीमार भी नही पड़ेंगे, मृत्युदर तो ना के बराबर.

कोरोना से मरे तो मरे, बाकी एक्सीडेंट से कोई नही मरेगा.

सारे झगड़े फसाद खत्म, न कोई प्रेम का चक्कर, न किसी को किसी पर शक, न शॉपिंग का चक्कर, न होटल या मूवी की फरमाइश... न घूमने जाने की ज़रूरत... न नई साड़ी की डिमांड न ज्वैलरी खरीदने की जिद्द.
सब कुछ ठीक ही चल रहा है. सही कहते थे लोग कि राम राज आएगा,
सच मे रामराज आ गया है...

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ऊपर एक अंग्रेज़ी गाने का वीडियो दिया गया है जो इन दिनों कोरोना वायरस के कारण लगे विश्वव्यापी लॉकडाउन के ऊपर बनाया गया है. 

यह गाना एक पैरोडी है जिसका मूल (original) अंग्रेज़ी गाना Bee Gees का Staying Alive है. Original song का लिंक नीचे दे रहा हूं, सुनिये और इस बेहतरीन गाने का आनंद लीजिये.

  

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NOTE :

कोरोना वायरस से जुड़े जीवन के तमाम पहलुओं को छूते मेरे अन्य लेख पढ़ने के लिये अंत में दिये लिंक को कॉपी पेस्ट करें :

1) Mass Exodus in History:
https://apurvaopinion.blogspot.com/2020/04/mass-exodus-in-history.html











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2)फासलों के दरमियां :
https://apurvarai.blogspot.com/2020/04/blog-post.html













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3) स्वाद का लॉकडाउन 
https://apurvarai.blogspot.com/2020/04/blog-post_28.html












4) Lockdown Changes Life & Style

https://apurvaopinion.blogspot.com/2020/05/lockdown-changes-life-style.html



April 06, 2020

फासलों के दरमियां... !




अपूर्व राय

इन दिनों घर में हूं... अपने परिवार के साथ. वजह है कि पूरे भारत देश में एक विकट सी स्थिति पैदा हो गई है एक ऐसी महामारी के कारण जिसने पूरी दुनिया को हिला के रख दिया है. कोरोना वायरस या चाइना वायरस जिसे कोविड 19 के नाम भी दिया गया है लोगों में भय का कारण बन गया है. पूरी दुनिया में हज़ारों- लाखों लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं और लाखों- करोड़ों इस महामारी से पीड़ित हैं. इंसान से इंसान को लगने वाली और एक वायरस से फैलने वाली इस बीमारी का पता ही नहीं चलता कब किसे लग गई, लिहाज़ा भारत में पूरी तरह लॉकडाउन लगा हुआ है. लॉकडाउन एक तरह का कर्फ्यू है जिसमें बाहर निकलने या कहीं आने-जाने पर पाबंदी तो है पर कानून की सख्ती नहीं है. 

आज की स्थिति यह है कि हम सब अपने-अपने घरों में जमे हैं, मिलना-जुलना बंद है क्योंकि ख़ैरियत इसी में है कि सबसे दूर रहें.

बैठे-बैठे मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे कि कभी सोचा न था कि एक दिन वो भी आएगा जब किसी से मिलना भी बंद हो जाएगा, कहीं जाना भी मुश्किल हो जाएगा, घर की ड्योढ़ी भी नहीं लांघ पाएंगे और वो भी 21वीं शती में. वाकई कितने अचरज की बात है कि अभी बमुश्किल दो दशक पहले ही 21वीं शताब्दी का कितने उल्लास और उत्साह के साथ स्वागत किया था हमने. लगता था नया दौर आ गया है जहां पिछड़ेपन और पिछड़ी सोच की कोई जगह नहीं है, विकास की नई राह है और टेक्नोलॉजी तो अद्भुत है, अकल्पनीय है. नई टेक्नोलॉजी ने दूर बैठे अपनों को पास ला दिया, दुनियाभर की जानकारी हमारी हथेली पर रख दी और पूरे संसार को ऐसा सिमटा दिया कि फासले लगभग खत्म हो गए.

नई शती के दो दशक बीतते-बीतते कोरोना नाम के वायरस ने ऐसा प्रकोप दिखाया कि सारी टेक्नोलॉजी धरी रह गई, विकास आसमान देख रहा है और फासले ऐसे बढ़ गए कि आप अपने सामने वाले से हाथ तक नहीं मिला सकते, उसे गले भी नहीं लगा सकते. और तो और घरों से बाहर निकलने में भी डर लगता है, पता नहीं कहां छुपा बैठा होगा दहशत का वायरस और हमें जकड़ लेगा.

वैसे ऐसा नहीं है कि आधुनिकता, विकास, आरामदेह और भागदौड़ से भरी ज़िंदगी में हम सब एक दूसरे से मिलने को लालायित थे-- कुछ तो व्यस्तता थी है पर उससे ज़ायादा था व्यस्तता का ढोंग. किसी से मिलने को कहो तो एक ही जवाब, 'भई वक्त मिलेगा तो ज़रूर बैठेंगे'. पर वक्त कभी किसी को मिला नहीं, या, यूं कहें कि किसी ने निकाला नहीं.

कोरोना वायरस शायद हम सबकी भावनाओं और बातों को चुपके-चुपके अपने भीतर सजो रहा था और एक दिन आया जब उसने हमला बोल ही दिया. आज शहर के शहर बंद हैं, आवाजाही ठप है. अब आप चाहकर भी किसी को बुला नहीं सकते, किसी से मिलने को सोच नहीं सकते और चाहकर भी कहीं जा नहीं सकते.

पहले हमने फासले बनाए लेकिन आज फासले हमारी मजबूरी बन गए हैं. आज खल रही है मित्रों की कमी, रिश्तेदारों का प्रपंच, दफ्तर के साथियों के उलाहने और पड़ोसियों की जलन. आज हर कोई पास होकर भी दूर है. वक्त है लेकिन मिल नहीं सकते, इच्छा है लेकिन मजबूर हैं. फासलों की ऐसी मजबूरी, वो भी 21वीं शती में, किसने सोची थी भला !

बेहतरीन शायर बशीर बद्र साहब की चंद लाइनें याद आ रही हैं --

यूँही बे-सबब न फिरा करो  कोई शाम घर में रहा करो  
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है  उसे चुपके चुपके पढ़ा करो.
कोई हाथ भी न मिलाएगा  जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है  ज़रा फ़ासले से मिला करो.
 




फिर भी बंदिशों के बीच ज़िंदगी चल रही है. कहते हैं न ढूंढो तो नकारात्मकता में भी सकारात्मकता मिल ही जाती है. ठीक उसी तरह फासलों ने बहुत कुछ ऐसा दिखाया है जिसके बारे में हम कम सोचते थे. फासलों ने भले ही बहुतों से दूर किया लेकिन ये हमें उन अपनों के करीब ले आए जिनकी हम सबको सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी लेकिन हमारा ध्यान कम था. हमने परिवार बनाया लेकिन इस परिवार को न वक्त दिया, न साथ दिया और न ही उसके करीब रहे. ये फासले हमें हमारे घरों के करीब भी ले आए जिन घरों को बनाने में अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया, जिन घरों को कितने शौक से सजाया था लेकिन अफसोस कभी उसे नज़दीक से जी भर के निहारा भी नहीं. घर ज़रूर हमारा था लेकिन सब कुछ दुनिया को दिखाने के लिये. अपने बनाए सपनों के घर में हम रहते ज़रूर थे पर उसका सुख हमें इब इन फासलों के दरमियां ही मिला. 



नामचीन शायर गुलज़ार साहब की एक रचना इन दिनों काफी चर्चा में है और यहां मौजू भी--







एक मुद्दत से आरज़ू थी फ़ुर्सत की...
मिली तो इस शर्त पर
कि किसी से ना मिलो !
शहरों का यूँ वीरान होना 
कुछ यूँ ग़ज़ब कर गया...
बरसों से पड़े गुमसुम घरों को 
आबाद कर गया !
घर गुलज़ार.., सूने शहर..,
बस्ती-बस्ती में कैद हर हस्ती हो गई...
आज फिर ज़िन्दगी महँगी
और दौलत सस्ती हो गई ..... !!

कितनी सच्चाई है इस कविता में. फासलों के दरमियां शहर वीरान हैं लेकिन घर गुलज़ार और हम यहां बसर कर रहें हैं अपनों के बीच. दहशत का वायरस हमें डरा ज़रूर गया है लेकिन अपनों के करीब कर गया है.

सोचता हूं फासलों के दरमियां परिवार के लिए बढ़ते प्यार के लिये कोरोना वायरस का शुक्रिया करूं या फिर उससे डरूं !

मेरे ख़्याल से.
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नोट

कोरोना वायरस से जुड़े जीवन के तमाम पहलुओं को छूते मेरे अन्य लेख पढ़ने के लिये अंत में दिये लिंक को कॉपी पेस्ट करें :

1) Mass Exodus in History
http://apurvaopinion.blogspot.com/2020/04/mass-exodus-in-history.html













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2) ठहरे कदम !

https://apurvarai.blogspot.com/2020/04/blog-post_17.html 














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3) स्वाद का लॉकडाउन
https://apurvarai.blogspot.com/2020/04/blog-post_28.html
 










4) Lockdown Changes Life & Style
https://apurvaopinion.blogspot.com/2020/05/lockdown-changes-life-style.html