August 06, 2016

बरसात की वो शाम और मेरा व्याकुल मन!



अपूर्व राय

गर्मी की तपती दुपहरी में आसमान की तरफ ताकते हुए मन में एक ही सवाल कौंधा-- उफ, कब इस नीले गगन पर कारे बदरा छाएंगे और कब आकाश से बरसती बूंदें तन-मन की अग्नि को शीतलता प्रदान करेंगी.

ऐसा नहीं है कि मेरा मन ग्रीष्म ऋतु से नाराज़ था लेकिन फिर भी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी. यह मनुष्य का स्वभाव है कि जैसे- जैसे समय नज़दीक आता जाता है मन की व्याकुलता बढ़ने लगती है और इंतज़ार की घड़ियां काटे नहीं कटतीं. मेरा मतलब है कि गर्मियां खत्म होने को थीं और हर दिन, हर पल वर्षा ऋतु का इंतज़ार था... जाने कब सावन बरसेगा, आसमान से बरसती बूंदें धरती की प्यास बुझाएंगी, कब मट्टी की खुशबू मेरी नाक तक पहुंचेगी, पेड़ों के मुरझाए पत्ते फिर से हरे होकर हवा के तेज़ झोंकों से झूमेंगे, कब आसमान में टिटहरी हल्ला मचाएगी और ज़मीन में मेंढक टर्राएंगे, कब सरसों के तेल में तले पकौड़े कढ़ाई से निकलेंगे और चाय की गर्म प्याली के साथ मिलकर महीनों की भूख मिटाएंगे और कब कजरी- सावनी के गीत कानों के रास्ते घुसकर आत्मा को शांति देंगे.

कुछ दिनों के सब्र और इंतज़ार के बाद आखिर मॉनसून ने दस्तक दे ही दी. उमड़-घुमड़ कर बादल आने लगे, कारी बदरिया ने सारा आकाश मानों अपनी आगोश में ले लिया, कौंधती बिजली और मेघ गर्जना से दिल भी दहला लेकिन फिर मूसलाधार बारिश नें महीनों की शिकायत दूर कर दी. आज मेरी सभी ख्वाहिशें पूरी हो गईं थीं और में जैसे कि आसमान में एक आज़ाद परिंदे की तरह उड़ रहा था.

उधर आसमान में बादल उफन रहे थे, इधर मेरी रसोई में चाय का पानी उबल रहा था. तेल खौल रहा था और पकौड़े तले जा रहे थे. उधर जंगल में मोर नाच रहा था, इधर मेरा मन मयूर भी नृत्य करने को बेचैन था. एक तरफ मिट्टी की सोंधी-सोंधी मादक महक पागल कर रही थी वहीं सरसों के तेल में बन रहे पकौड़ों की खुशबू ने भूख बेकाबू कर दी थी. किसी ने घर की खिड़की बंद कर दी, लेकिन मैंने खोल दी क्योंकि आज बौछारों को भी मेरे शयन कक्ष में बेरोकटोक घुस आने की खुली छूट थी. किसी जाते हुए राहगीर की चाल तेज़ हो गई थी ताकि वो ऐसी जगह पनाह ले ले जहां उसके कीमती वस्त्र बरसात के पानी से भीग न जाएं. लेकिन मेरे मिजाज़ में संगीत था, अल्हड़पन था और इसी कारण मैंने अपनी शर्ट तक उतार दी और बंद कमरे से निकल खुली छत पर जा बैठा जहां बरसात की हर एक बूंद मेरे तन-मन को भिगो रही थी. आखिर ये महीनों की प्यास थी और आज ही मैं इसे पूरी तरह बुझा लेना चाहता था.

खुली छत से मैनें क्या नहीं देखा. कहीं बच्चे सड़क पर लगे पानी में छपाक-छपाक करते देखे तो कुछ बच्चे रिक्शे में भीगते हुए स्कूल से घर को जाते देखे, रंग-बिरंगी छतरियों मे दुबके खुद को बारिश से बचाते हुए लोग देखे, ढेरों लोगों को एक बस स्टैंड में सिमटे देखा, कुछ लोगों को बरसाती पहनकर स्कूटर-मोटरसाइकिल पर जाते देखा, और सड़क पर जमा पानी को दूर तक उछालकर लोगों को भिगोकर रफू-चक्कर होती कारें भी देखीं-- कितना दिलकश था ये नज़ारा. लोगों के चेहरों पर परेशानी और उलझन थी मगर मन में खुशी भी थी. आखिर आज झमाझम बरसात जो रही थी.

मुझे आज महसूस हो रहा था कितना खूबसूरत होता है सावन की महीना और घनघोर बारिश का मज़ा. दूर-दूर तक फैले घनघनातै हुए काले बाद और उनके बीच चमकती बिजली-- मैं जी भर के बारिश में भीगा. काफी समय कुदरत के साथ बिताने के बाद आखिरकर मैं छत से उतर आया. घर आने के बाद भी बारिश घंटों चलती रही और मन को प्रसन्न करती रही.
समय काफी बीत गया था और आज अंधेरा भी जल्दी हो गया. खिड़की से बाहर झांककर देखा तो हैरान रह गया. सड़क पर वाहनों की जली बत्तियां देखकर महसूस कर रहा था कितना मुश्किल हो रहा होगा गाड़ी चलाना. वाहनों की संख्या भी बढ़ गई थी और सड़कों पर कारों, बसों और स्कूटरों की लंबी कतार खड़ी थी.

सभी परेशान लग रहे थे क्योंकि किसी को आगे बढ़ने का कहीं कोई रास्ता नहीं था. मेरा मन कचोटने लगा और मैंने सोचा इन लोगों का भी तो मन कर रहा होगा गर्म चाय पीने का, समोसे और पकौड़े खाने का और सावन के रंगीन गीत सुनने का. लेकिन सच्चाई यह थी कि ये सड़क पर फंसे दूसरे वाहनों का धुंआ खा रहे थे, बारिश की बूंदे पी रहे थे और सड़क पर हो रहा शोरगुल सुन रहे थे.

मैं कितना भाग्यशाली था जिसने आज बारिश का भरपूर मज़ा लूटा. लेकिन ऐसा सबके साथ नहीं था-- सड़क पर चल रहा हर आदमी एक कड़वी सच्चाई से रू-बरू हो रहा था. सड़कों पर दिख रही थी वाहनों की कभी न खत्म होती कतार और रेंग- रेंग कर धीमी गति से बढ़ती गाड़ियां. वाहनों की मद्धम चाल से लाखों की कीमत का हज़ारों लीटर पेट्रोल बर्बाद हो रहा था और उनके धुंए से वातावरण में ज़हर घुला जा रहा था. पर लोग मजबूर थे और जिनको परवाह करनी चाहिए उन्हें फिक्र कहां. अफसोस ये कि मेहनत की कमाई से खरीदा महंगा पेट्रोल जल गया, गाड़ी डिगी तक नहीं और लोग जहां के तहां खड़े रह गए. उधर सड़क पर घुटनों तक लगे पानी की वजह से कितने ही वाहन बंद हो गए थे और लोग उसी मैले पानी में उतरकर धक्का लगा रहे थे. अब ऐसे में भला किसे सुनाई देगी मेंढक की टर्र-टर्र. अभी तो आम आदमी ही टर्रा रहा था कि लो आज पहली ही बरसात में ऐसा हाल-- तौबा रे तौबा!

मन इस ख्याल से ही सिहर उठा कि सचमुच अगर एक शाम भी किसी के साथ ऐसा हो जाए तो बेचारा हट्टा-कट्टा आदमी भी तन और मन से बीमार नहीं पड़ेगा तो और क्या होगा. मुझे लगा किसी ने आपके शहर के विकास के नाम पर आपसे वोट लिए होंगे, कोई इस वायदे के साथ बड़का बाबू बना होगा कि वो देश और समाज की सेवा करने की नीयत रखता है... लेकिन सब गुम दिखे आज. गुम क्या दिखे सच मानिये तो आज की बारिश का असल लुत्फ तो वही ले रहे होंगे और हमारा-आपका क्या, हम तो दिन काट लेंगे और सब कुछ भुलाने का नाटक करते हुए कल फिर एक नई उम्मीद के साथ पानी से भरी इन सड़कों पर उतरेंगे.

सचमुच किसी की लापरवाही मेरे कष्टों का इतना बड़ा कारण भी बन सकती है ऐसा मैने शायद ही कभी सोचा था. बस इसी विचार से मेरा मन एक बार फिर व्याकुल हो गया. है कोई जो मेरी इस व्याकुलता को दूर करेगा!

मैं खबरिया चैनल देख रहा था और लोगों की परेशानी महसूस कर रहा था. सड़कों पर फंसे हजा़रों वाहनों और इंसानों के बीच मेरी निगाहें उन नेताओं को ढूंढ रही थीं जो चुनाव से पहले बड़े- बड़े बोल बोलते हैं, लंबी-चौड़ी बातें करते हैं और हसीन सपने दिखाते हैं. मेरी निगाहें उन अफसरों को भी ढूंढ रही थीं जो नौकरी का इंटरव्यू देते हुए समाज सेवा की बात करते हैं, अपने अधिकारों से बदलाव लाने की बात करते हैं और नागरिकों की सहुलियतों के बारे में कहते नहीं थकते. मेरी निगाहें पथरा गईं लेकिन ऐसा कोई दिखा नहीं. आज मेरा मन आश्वस्त हो गया कि नेता वोट के आगे की सोच ही नहीं पाते और अफसर सरकारी सुविधाओं के आगे बेबस हो जाते हैं. लेकिन यह भी सच्चाई है कि रात तो बीत ही जाएगी और कल का सवेरा एक नए कलेवर के साथ आएगा. कल नेताओं की नींद खुलेगी, मंत्री लीपापोती करेंगे, छींटाकशी करेंगे, कोई इसको तो कोई उसको दोषी ठहराएगा, तकलीफें दूर करने के लिए एक बार फिर से नए वादे किए जाएंगे, कमेटियां बनेंगी, अफसर तलब होंगे और न जाने क्या-क्या. इस बीच सड़कों का पानी धीरे- धीरे उतर चुका होगा, लोग फिर से अपने काम में जुट गए होंगे और हम सब फिर से इंतज़ार करेंगे अगली बरसात का... एक बार फिर से समस्या के उभरने का.

मुझे इंतज़ार है उस वक्त का जब मैं नहीं बल्कि ये नेता और अफसर व्याकुल होंगे और कसम लेंगे कि आम आदमी को इस तरह के हालात से दोबारा रू-बरू नहीं होना होगा. मुझे इंतज़ार है उन व्याकुल नेताओं, मंत्रियों और अफसरों को देखने का जो लोगों की तकलीफों से इतने व्याकुल हो जाएं कि घर पर रुक न सकें और फौरन बाहर आकर जनता के साथ साथ सड़क पर खड़े दिखें-- बाद में छींटाकशी और रिपोर्ट तैयार करते हुए नहीं.

आखिर बरसात का मौसम है, मौज-मस्ती का मौसम है. इसमें प्रेम है, भूख है, नादानी है, शोखी है... ऐसे में मेंढक को ही टर्र-टर्र करने दें, हम इंसानों के लिए तो ये बरसात की बूंदे सुकून लेकर आती हैं, आज उसी का आनंद लेने दें.

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1) https://apurvaopinion.blogspot.in/2017/07/monsoon-and-delhi-roads.html
Monsoon and Delhi roads

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उफ, ये सावन बीता जाए

March 24, 2016

आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया

By APURVA RAI

THESE photographs were clicked while I had gone to Chandni Chowk market in Delhi ahead of Holi, the festival of colours celebrated with fervour in north India.

During my trip to the market I happened to witness this culture parade marking Holi festivities denoting Lord Krishna and his beloved Radha. Krishna and Radha, natives of Mathura, near Delhi, are known for their love, romance and dance-drama and colours of Holi make them all the more playful.

The culture parade depicted dance and romance of Radha- Krishna while playing Holi colours in Mathura/ Braj/ Vrindavan.

Young artists dancing to lovely Holi songs enthralled people present in the market. I could not resist and immediately clicked some pictures with my mobile. I am using Microsoft Lumia 532 mobile phone which has a 5mp rear (main) camera.

The dance and romance depicting Radha- Krishna are directly related to Holi festivities. 



Some of these pictures are here for you to taste love, dance, bonhomie and celebrations that this festival of colours is known for. I must admit that the picture quality has been enhanced on Adobe Photoshop.

होली रे रसिया. Pix APURVA RAI


आजा रसिया अब होरी खेलें, फ़ाग चढ़ चढ़ आयो
रंग ले अपने रंग मोहे सांवरिया, और रंग ना भायो ।।



होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

होली राधा-श्याम की और न होली कोय,
जो मन राचे प्रेम रंग फिर रंग चढ़े न कोय ।।




होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

माथे पे बिंदिया, नैनों में काजल सालो री,
नाक में नथनी और शीश पे चुनरी डालो री,
होली खेलन आया श्याम आज इसे रंग में बोरो री ।।


होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

नंदग्राम के जुरे हैं सखा सब, बरसाने की गोरी रे रसिया,
दौड़ मिल फाग परस्पर खेलें, कहि कहि होरी होरी रे रसिया।



होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

रंग-रंग राधा हुयीं कान्हा हुए गुलाल,
बृज क्षेत्र सब होली हुआ बृजवासी रचें धमाल ।।





होली रे रसिया. Pix APURVA RAI
होरी के रसिया होरी खेलें सखियाँ सब हर्षायो,
श्यामाश्याम रंग चढ़ गयो मोहे और रंग ना भायो ।।


होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

तन रंग डाला, मन रंग डाला, अबीर लगाओ जी भर के।
होली आई रे...
घूंघट लगाओ गोरी, मुखड़ा दिखाओ, दूर मत जाओ गोरी डर डर के।
होली आई रे...



होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

रंग दे चूनर अपने रंग में ही लहंगा गयो रंगायो,
भर भर मारे श्याम पिचकारी ऐसो आनंद छायो ।।


होली रे रसिया. Pix APURVA RAI
होरी खेलूँगी भयाम तोते नाय हारूँ
उड़त गुलाल लाल भए बादर, भर गडुआ रंग को डारूँ
होरी में तोय गोरी बनाऊँ लाला, पाग झगा तरी फारूँ
औचक छतियन हाथ चलाए, तोरे हाथ बाँधि गुलाल मारूँ।



होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भए बादर, केसर रंग में बोरी रे रसिया।
 



होली रे रसिया. Pix APURVA RAI

रंग गुलाल उड़ उड़ रहे पवन में, ऐसो रंग बरसायो
मन मोरा भी रंग दे सांवरिया, देख अब फागण आयो ।।
रंग दे चूनर अपने रंग में ही लहंगा गयो रंगायो
भर भर मारे श्याम पिचकारी ऐसो आनंद छायो ।।


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होली के रंग हज़ार हज़ार
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February 18, 2012

मैंने देखा एक सियासी सपना


अपूर्व राय

कहते हैं कि सपनों की भी अपनी अलग ही दुनिया होती है. हकीकत में जिन चीज़ों को हम पा नहीं सकते सपनों में उन सबको सहजता से हासिल कर लेना नामुमकिन नहीं. यह बात भी कितनी सच है कि अगर सब कुछ असल ज़िंदगी में मिल ही जाता तो सपने भला आते ही क्यों!
मैंने भी कई तरह के सपने देखे हैं. मेरे सपने कभी मुझे लंदन- अमेरिका की सैर करा लाए तो कभी हसीनाओं के संग अठखेलियां करने के लिए समंदर किनारे भी छोड़ दिया. ये मरे सपने ही हैं जिनमें मुझे अपनी नौकरी में इतना बड़ा प्रोमोशन मिला कि मैं अपने बॉस का बॉस बन गया. सपनों की रंगीन दुनिया के सहारे ही मैं कभी लंबी सी कार में बैठकर फाइव स्टार होटल में डिनर करने गया तो कभी ठीक इसके उलट रेलवे स्टेशन के बाहर चरसियों के बीच रात गुज़ारी.
मैं दूसरों के सपनों के बारे में तो नहीं जानता पर अपने सपनों के बारे में ज़रूर कह सकता हूं कि मुझे कुछ इसी तरह के अजब-गजब सपने आते रहते हैं. शायद इसी लिए कभी व्याकुल हो जाता हूं कि कहीं मुझमें कोई ऐब तो नहीं जो इस तरह के सपने दिखाई देते हैं.
कभी- कभी सोचता हूं तो लगता है कि शायद मैं बहुत संवेदनशील हूं और जो कुछ भी गहराई से महसूस करता हूं, देखता हूं या फिर जो बातें मेरे दिल-दिमाग़ को छू जाती हैं वो सब किसी न किसी रूप में कभी न कभी मेरे सपनों का हिस्सा बन जाती हैं.
हमारे देश में राजनीति और क्रिकेट का बहुत महत्व है. पता नहीं क्यों क्रिकेट कभी बहुत अपील नहीं किया परन्तु राजनीति और नेता मुझे अकसर झकझोरते रहते हैं.


राजनीति के प्रभाव और फैलाव का ही असर है कि कुछ दिन पहले मेरे सपने में एक नेताजी आए. उनके पास कोई सत्ता या राजनीतिक पद तो नहीं था पर राजनीति के गलियारों में उनका कद बहुत ऊंचा था. वो मंत्री तो नहीं थे पर लोगों को मंत्री बनवाने का रुतबा रखते थे.
नेताजी से मेरी मुलाकात दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई. मुझे दफ्तर के काम से चेन्नई जाना था और उन्हें भी किसी चुनावी सभा में भाग लेने के लिए. इत्तफाक की बात कि नेताजी के साथ कई टीम-टाम नहीं था और हम दोनों एयरपोर्ट पर अगल-बगल बैठकर फ्लाइट का इंतज़ार कर रहे थे. कुछ ही पलों में न जाने कैसे और क्यों हम एक दूसरे से खुल गए. बातों- बातों में नेताजी ने मेरे बारे में काफी पूछताछ कर डाली, मसलन मेरी नौकरी, तन्ख़्वाह, मेरी आकांक्षाएं, मेरा परिवार आदि. देश, समाज और राजनीति पर भी हमारी काफी बातचीत हुई. जान-पहचान और अपनापन कुछ इतना बढ़ गया कि हमने तय किया कि हम लोग चेन्नई में भी मौका निकालकर मुलाकात करेंगे.
मैं चेन्नई के एक होटल में ठहरा और वह एक सरकारी भवन में. दूसरे दिन सुबह ही नेताजी ने मुझे बुलावा लिया और कुछ ही देर में एक गाड़ी होटल के नीचे आ खड़ी हुई. सफेद रंग की रपारप टाटा सफारी, सीटों पर सफेद कवर और चारों ओर काले शीशे. कार में एक ड्राइवर, एक सिक्योरिटी गार्ड और एक अर्दली. मेरा मन तो गदगद हो गया. इतनी शान से सड़क पर चलूंगा यह तो मेरी कल्पना से भी परे था.
थोड़ी ही देर में मैं नेताजी के पास था. सोचा था सरकारी भवन में रुके हैं, सरकारी किस्म का ही होगा. पर यहां के ठाट-बाट तो मेरे होटल से कहीं अधिक थे. नेताजी एक बड़े से कमरे में कोई बैठक ले रहे थे सो मुझे एक अन्य कमरे में आराम करने के लिए कहा गया. यह कमरा भी कम नहीं था. शानदार-आरामदेह बेड और उसपर सफेद चादर- तकिया-तौलिया और बगल में पढ़ने की मेज़-कुर्सी. दूसरी तरफ बढ़िया सा सोफा सेट था, उसके ठीक सामने दीवार पर एलसीडी टीवी और फर्श पर साफ-सुथरा कालीन. सरकारी चमक-दमक मुझे भा गई.
करीब एक घंटे के बाद नेताजी आए और हमारी बातों का सिलसिला शुरू हुआ. इस बार बातें राजनीति, शासन, समाज और आम आदमी से जुड़ी हुई थीं. थोड़ी ही देर में नेताजी ने कहा कि राजनीति में आओगे! मैं सकपका गया और वह मेरी घबराहट भांप गए. बोले घबराओं नहीं मेरा हाथ तुम्हारे ऊपर रहेगा और तुमको हर जगह वीआईपी ट्रीटमेंट मिलेगा. मन तो ललचाया पर राजनीति मेरी पिछली सात पुश्तों में किसी ने नहीं की थी. उल्टे सभी लोग नेताओं का मज़ाक ही बनाते रहते हैं. तरह-तरह के सवाल मेरे मन में उठने लगे. नेताजी ने कहा घबराओँ मत और हां कर दो, ज़िंदगी संवर जाएगी और आने वाली पुश्तें भी निश्चिंत हो जाएंगी.
मैंने कहा हां तो कर दूं पर कामकाज कैसे करूंगा, मुझे तो इस विधा का दूर-दूर तक ज्ञान नहीं है. नेताजी ने कहा कि राजनिति ही तो वह विधा है जिसके लिए किसी विशिष्ट ज्ञान, शिक्षा या योग्यता का होना ज़रूरी नहीं है. शिक्षित हो, डिग्री होल्डर हो, एक सफल करियर का सपोर्ट भी है. तुम्हें मंत्री बनाने के लिए बस इतना काफी है.
वाह, सपनों में एक नेता ने मुझे मंत्री बनने का सपना दिखा दिया. अब तो मैं सचमुच सपने बुनने लगा. फिर भी मन में शंकाएं थीं. लग रहा था कि राह आसान नहीं है और अगर कहीं नैया डूबी तो राजनीति तो जाएगी ही करियर से भी हाथ धो बैठूंगा.
इसके बाद तो नेताजी ने एक लेक्चर ही पिला दिया. बोले डॉक्टर, इंजीनियर और बड़े-बड़े मैनेजरों को तुमने नेता बनते देखा होगा पर क्या कभी किसी नेता को वापस डॉक्टर, इंजीनियर या मैनेजर बनते सुना है. उन्होंने कहा कि राजनिति नौकरी की तरह सुरक्षित तो नहीं है पर इसमें पैसे और शोहरत की कमी भी नहीं है. मीटिंग, कामकाज और चुनाव के कारण देशाटन करने का भरपूर मौका मिलता है. हवाई जहाज़ का खर्च, रहना-खाना, गाड़ी-बंगला तो देख ही रहे हो, ठसके में कोई कमी लग रही हो तो बताओ? और यह सब मेरे पास तब है जब मैं मंत्री तक नहीं हूं.
नेताजी ने कहा कि चुनावी सभा में लोगों का दिल जीतने के बजाय उनका ब्रेन वॉश करना ही तुम्हारा मकसद होगा. इसके लिए सच का झूठ और झूठ का सच भी कहना पड़े तो घबराना मत, ये सब तो बातें हैं—आज कह दीं, कल भूले. सफलता के लिए सिर्फ अपनी पार्टी और अपने काम का ही गुणगान करते रहो. साथ ही दूसरी पार्टी की बुराई और उसके नेता पर उंगली उठाने से मत चूकना, बस जीत पक्की समझो.
उन्होंने कहा कि आम आदमी बहुत मासूम होता है और उसकी भावनाएं कोमल. जहां जाओ वहां के लोगों के बारे में पहले से ही फीडबैक ले लो और मिलने पर उन्हीं की भाषा बोलो, उनकी समस्याओं के बारे में बातें करो और उनको आगे बढ़ने का सपना दिखाओ, बस जीत पक्की समझो.
रैलियों में भाग लेने से लेकर मंत्री बनने तक तुम छोटे-बड़े इतने इलाकों में घूम चुके होगे और इतने लोगों से उनकी इतनी समस्याएं सुन चुके होगे कि मंत्री बनने पर कुछ भी याद नहीं रहेगा. और मंत्री बनने के बाद इतने बड़-बड़े काम होते हैं कि गली-मोहल्लों की बातें पूरी करने का वक्त किसके पास है. मोटे-मोटे काम कर दो और उन्हें जताने में पीछे मत रहो. बस सफलता पक्की समझो.
हो सकता है कुछ लोग तुम्हें बेशर्म कहें या मौकापरस्त पर कामयाबी की कुछ तो कीमत चुकानी पड़ती है मेरे यार. उन्होंने कहा कि आखिर नौकरी में भी तो तुम कभी झूठ बोलते हो, अपने काम की तारीफ और दूसरे के काम की बुराई करते हो. इतना ही नहीं तरक्की पाने के लिए बॉस की चाटुकारिता भी करते हो. दिन-रात इसी में गुज़र जाते हैं कि नौकरी बनी रहे, बॉस खुश रहे, प्रोमोशन मिलता रहे और सालाना इन्क्रीमेंट अच्छा हो जाए.
नेता भी यही सब करते हैं. फर्क ये है कि यहां पर इसका फायदा बड़े लेवल पर होता है. रहने को बड़ा बंगला मिलता है, हवाई जहाज़ से देश-विदेश जाते हो, नौकर-चाकर, सेक्रेटरी और आगे-पीछे घूमते लोग. करोड़ों रुपए का बजट हाथ में है और कोई पूछने वाला नहीं कहां खर्च किया और कैसे. किसी का काम करना नहीं है, करने का आदेश दे देना है. काम हो गया तो वाह-वाही आपकी और अगर और नहीं हुआ तो विरोधियों की चाल. ऊपर से तुम्हारा हर काम समाजसेवा कहलाएगा और देशभक्त कहलाने का सम्मान जो मिलेगा वह अलग. यही तो वजह है कि जो लोग राजनीति में एक बार आ जाते हैं वो कहीं और नहीं जाते.  
सत्ता बड़ी चीज़ है भैया, बस हर नेता को थोड़ा चमड़ी मोटी करनी ही पड़ती है. थोड़ी होशियारी से चलो और ज़रूरत से ज़्यादा लालच अगर न रखो तो लंबी पारी पक्की समझो.
नेताजी की बातें मुंगेरीलाल के सपनों से कम नहीं थीं और मैं इन्हें समझ भी रहा था. पर फिर भी मैने तय कर लिया कि अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़ दूंगा और राजनीति के समंदर में कूद जाऊंगा. अगर मोती पाना है तो तालाब में नहीं, सागर में गोता तो लगाना ही होगा.
इतनी देर में घड़ी का अलार्म घनघना उठा. मेरी नींद खुल गई और सपना टूट गया. पलंग पर मैं अकेला पड़ा था और मेरे चारों तरफ थीं कोरी दीवारें. रात के अंधेरे में एक नेता मेरे सपने में थे, पर अब दिन के उजाले में अपने सपनों के नेता को तलाशने की कोशिश कर रहा था.